Monday, 2 January 2017

दुनिया का सबसे खुशहाल इंसान बनने का फॉमूला

आपको एक ऐसे इंसान से मिलवाने जा रहा है, जो दुनिया का इकलौता सबसे खुशहाल इंसान है। जो आखिरी बार 1991 में दुखी हुआ था। जिसकी खुशी से हैरान होकर अमेरिकन यूनिवर्सिटी ने खुशी का कारण जानने के लिए 12 साल तक रिसर्च किया हो.. वो भी दिमाग में 256 सेंसर लगाकर। और इन सबके बाद जिसे खुद यूनाईटेड नेशन (UN) ने धरती का सबसे खुशहाल इंसान माना हो। जिसने 45 साल में खुशी को अपनी आदत बना लिया हो।
मैथ्यू के मुताबिक, 'उनके हमेशा खुश रहने के पीछे का क्या राज है ये जानने के लिए अमेरिकन की नंबर 1 साइंटिफिक यूनिवर्सिटी विसकॉन्सिन के साइंटिस्ट से मेरे दिमाग पर 12 साल रिसर्च किया।'
- 'इस दौरान मेरे सिर पर 256 सेंसर लगाकर बुरी से बुरी परिस्थितियों में दिमाग के अंदर क्या चल रहा है.. कैसे काम कर रहा है.. इसकी पूरी रिपोर्ट तैयार की।'
- 'इस रिसर्च में मेरे अंदर एक गामा तरंग पाई गई। ये तरंग दुनिया में बहुत कम लोगों में डेवलप होती है। इसका काम हर कंडीशन में खुशी के लेवल को बढ़ाना होता है। इस तरंग को मैंने खुद डेवलप किया था।'


 सुबह उठते ही पीले रंग की किसी आकृति को 1 से 2 मिनट तक आंखें बड़ी करके लगातार देखें।

- फिर आंख को 30 सेकंड बंद करके दोबारा खोलें। अब आप रूटीन वर्क स्टार्ट सकते हैं। 
- संभव हो तो ऐसा सुबह के उगते सूरज की तरफ देखकर करें।
इससे कैसे खुशी मिलेगी:

- न्यूरो साइंस में पीला रंग खुशी और उम्मीद को रिफ्लेक्ट करता है। 
- ऐसे में सोकर उठते ही इंसान के दिमाग में मौजूद हैप्पीनेस का केमिकल एक्टिव हो जाएगा। अगले कुछ घंटे दिमाग खुश रहेगा।
- इसी साइंटिफिक कारण के चलते स्माइली के इमोजी का कलर पीला रखा गया है।
- बता दें, इंसान के दिमाग में हैप्पीनेस के 4 केमिकल होते हैं। इनका शॉर्ट फॉर्म DOSE है।



कब करें: सुबह उठने से सोने तक हर घंटे

तरीका:

- अपनी जगह पर खड़े होकर पहले हाथ ऊपर करें। 10 सेकंड के लिए बॉडी को स्ट्रेच करते हुए अपने किसी सोशल अचीवमेंट के बारे में
सोचे। नोट करें।
- मैथ्यू के सजेशन से गूगल ने इस एक्सरसाइज को अपने इम्प्लॉइज के मैनुअल में शामिल किया।
इससे कैसे खुशी मिलेगी:

- हाथ ऊपर पर बॉडी को स्ट्रेच करने से हमारी मांसपेशियां रिलेक्स मोड में चली जाती हैं।
- दिमाग इसे रीड करके फीलिंग कैमिकल्स को नॉर्मल कंडीशन में ले आता है।
- ऐसे में सोशल अचीवमेंट के बारे में सोचने पर खुशी-प्राइड केमिकल्स एक्टिव हो जाते हैं।






कब: जब भी खुश होना चाहें
तरीका:

- वर्किंग प्लेस या घर में अपने डियर वन की मुस्कुराती तस्वीर जरूर लगाएं।
- जब आप टेंशन फील करें या एनर्जी लेवल लो लगे तो इस तस्वीर को 1 मिनट तक लगातार देखें।
- ध्यान रहे इस दौरान दिमाग में और कुछ ना चले। सिर्फ तस्वीर पर फोकस हो।
- तस्वीर ना हो तो रोड़ पर चलती गाड़ियों या खिड़की के बाहर गार्डन की घांस को भी देख सकते हैं।
इससे कैसे खुशी मिलेगी:

- लगातार 1 मिनट तक देखने पर दिमाग फ्लैश बैक में चला जाता है।
- रिसर्च के मुताबिक, इससे दिमाग में उस डियर वन से जुड़ी पॉजिटिव याद रिकॉल होती है। 1 मिनट तक देखने से ये यादें स्ट्रेस
रिलीज करके खुशी केमिकल को ब्रेन में फैला देता है।
- बता दें, एक स्वस्थ इंसान के दिमाग में सबसे पहले एक्टिव होने वाला केमिकल हैप्पीनेस का ही होता है।




कब करें:डिप्रेशन फील होने या जब अनुमान के मुताबिक परिणाम न मिले

तरीका:



- जैसे नॉर्मल खाते हैं वैसे खाएं।
इससे कैसे खुशी मिलेगी:

- चॉकलेट और अखरोट में polyphenols केमिकल होता है।
- ये बॉडी में जाकर दिमाग के हैप्पीनेस पार्ट को एक्टिव करने का काम करते हैं। 
- डार्क चॉकलेट खाने पर इसका असर और बढ़ जाता है।









कब करें:हर घंटे या जब नर्वस फील करें
तरीका:
- हंसी ना भी आए तो मुंह खोलकर हंसे।
इससे कैसे खुशी मिलेगी:

- जब मुंह खोलते हैं तो दिमाग के आगे की तरफ वाली हैप्पीनेस नसें पर जोर पड़ता है।
- इससे इनमें खिंचाव आता है। और एक्चुअल साइज से ज्यादा फैल कर कैमिकल स्प्रेड करती हैं।
- जो कुछ देर के लिए हैप्पीनेस लेवल बढ़ाता है।

Thursday, 30 June 2016

गौरैया के आशियाने को मिली नई 'उड़ान'


परिंदे पर्यावरण के सच्चे प्रहरी कहे जाते है। उन्हें पर्यावरण दूत का भी दर्जा दिया गया है। लेकिन अंधाधुंध शहरीकरण के बीच हमने उनका बसेरा छीन लिया है। अब आसमान में परिंदों के पर फड़फड़ाते है। फिजाओं में उनकी कूक,चींची सुनाई देती है। लेकिन उनके आशियाने को हमने उजाड़ दिया है। या यूं कहे कि हमें फिक्र ही नहीं रही कि हमारी तरह इन परिंदों का भी कोई बसेरा हो। सबसे ज्यादा उन नुकसान घर के आंगन में बरबस फुदकने वाली उस गौरैया के साथ हुआ जिसे आज भी हाउस स्पैरो यानी घर की चिड़िया कहा जाता है। परिंदों के लिए बसेरा उनके लिए सवेरा होने जैसा ही है। इसी कोशिश में दिल्ली के पर्यावरणविद राकेश खत्री की एक नई और अनोखी पहल रंग लाई है जो गौरैया संरक्षण पर पिछले कई वर्षों से काम कर रहे हैं।
राकेश खत्री पिछले कई साल से पर्यावरण के अलग-अलग सेगमेंट में काम कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से वह पक्षियों के संरक्षण पर भी काम कर रहे हैं। फिलहाल वह गौरैया संरक्षण के साथ जल संरक्षण पर भी काम कर रहे हैं। वह देशभर में 15 हजार से ज्यादा घोंसले बना चुके हैं। लेकिन घोसले बनाने की उपलब्धि को राकेश खत्री बड़ा नहीं मानते। उनका कहना है 'जब मैं इन घोसलों को बनाता हूं तो इसके पीछे मेरी एक आस होती है, उम्मीद छिपी होती है और उसको साकार करने के लिए मैं इस कवायद को अंजाम देता हूं। मैं चाहता हूं कि जिस घोसले को बनाऊं उसमें वो पक्षी आकर रहे जिसके लिए यह बनाया गया है।' उनके मुताबिक हर पक्षी के घोंसले में थोड़ा-बहुत फर्क होता है लेकिन आशियाना तो आशियाना होता है। इंसान अपनी पूरी जिंदगी एक आशियाने की खातिर क्या कुछ नहीं करता लेकिन अपने आसपास पर्यावरण के इन दूतों (परिंदों) के बारे में नहीं सोचता। वह चाहते है कि लोग तेज रफ्तार से अपनी भागती दौड़ती कश्मकश से भरी जिंदगी में से थोड़ा वक्त निकाले। क्या उस गौरैया की खातिर एक घोसला भी नहीं बना सकते जो रूठकर हमारे घर के आंगन से चली गई है?

गौरैया के घोसले के एक आशियाने में तब्दील होने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। राकेश खत्री कहते हैं 'जो घोसला हम बनाकर एक प्रतीक के रूप में इन गौरैयों को देते है। उसे घर के रूप में बदलने की कवायद की सबसे पहली पहल नर गौरैया करता है। वह घोसले में तिनका-घास-फूस सात से आठ दिनों तक लगातार लाता है। इसके बाद उन लाए हुए तिनके-घास-फूस को करीने से संवारने के लिए मादा गौरैया का घोसले में प्रवेश होता है। मादा गौरैया इन बिखरे हुए तिनके को करीने से सजाती-संवारती है और उसे दोनों (नर और मादा गौरैया) के रहने के लिए घर का रूप देती है। अब इस घोसले में दोनों रहने लगते है। जब अंडे देने के बाद मादा गौरेये उसे सेती है और जबतक उसमें से चूजे नहीं निकल जाते , इस दौरान पूरा ख्याल नर गौरैया रखता है। मादा गौरैया घोसले से बाहर नहीं निकलती और उसके खाने-पीने का पूरा बंदोबस्त नर गौरैया ही करता है।' हर घोसला दो गौरैया से गुलजार होता है जिसमें नर और मादा रहते है। अंडे देने उसके सेने का चक्र चलता रहता है इस तरह से गौरैया के परिवार में नए सदस्यों के आगमन का यह सिलसिला चलता रहता है। लेकिन यह सबकुछ आशियाने पर निर्भर करता है। क्योंकि घोसला इनके जीवन में ठीक वही भूमिका निभाता है जो इंसान के जीवन में एक घर का महत्व होता है।

परिंदों से जुड़े कुछ अलफाजों को अगर आप ध्यान से सुने तो बड़ा सुकून मिलता है। इन शब्दों में गजब की ताजगी है जो आपको ऊर्जा से भर देती है। जरा गौर कीजिए। फुर्र-फुर्र, फुदकना, चुगना,चीं-चीं,चहचहाहट,चूं-चूं,चुग्गा,कलरव,फड़फडाना,चोंच आदि। एक नन्ही गौरैया आपके घर के दरवाजे के बाहर बैठी है। वो इस आस में बैठी है कि घर का दरवाजा कभी तो खुलेगा।  क्या आप घर का दरवाजा खोलेंगे?

Saturday, 22 August 2015

भारत क्या भेंट कर सकता है दुनिया को

भारत के 68वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, सद्‌गुरु बता रहे हैं कि भारत किस तरह दुनिया की महाशक्ति बन सकता है। इसके लिए दुनिया को जीतने की नहीं, बल्कि सभी को खुद में शामिल करने की जरूरत होती है।
1992 में भारत रत्न पुरस्कार मिलने के बाद जेआरडी टाटा ने कहा था, ‘मैं भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में नहीं देखना चाहता। मैं भारत एक खुशहाल देश के रूप में देखना चाहता हूं।’
आज सिर्फ उसका ही सम्मान किया जा रहा है जिसके पास ताकत है। इसकी वजह यह है कि हमने ऐसी दुनिया नहीं बनाई, जहां सौम्यता की, भद्रता की इज्जत की जाए। लेकिन सोचने की बात यह है कि क्या शक्ति, धन-दौलत इकट्ठा करने का यह पागलपन हमें खुशहाल बना रहा है? भारत पर अब दुनिया भर की नजर है। इस बात का ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि हम दुनिया के सामने अपनी कैसी छवि पेश कर रहे हैं, हमारे पास दुनिया को देने के लिए क्या है।
ज्ञानियों को पैदा करने की तकनीक
हम भूल गए हैं कि भारतीय संस्कृति का मर्म या सारतत्व हमेशा इंसान की मुक्ति या मोक्ष रहा है। किसी दूसरी संस्कृति ने इंसान को इतनी गहराई और समझ के साथ नहीं देखा और उसे अपनी चरम प्रकृति तक विकसित होने के तरीके नहीं बनाए। साफ और खुले तौर पर कहें तो हमारे पास ज्ञानी बनाने की तकनीकें हैं। पश्चिमी समाज राजनीतिक, सामाजिक और शारीरिक मुक्ति की बात करते हैं, मगर हमने हमेशा चरम मुक्ति या मोक्ष को अपना सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य माना है।
हमें यह समझने की जरूरत है कि यह भारतीय आध्यात्मिक चरित्र किसी विश्वास या मत प्रणाली से जुड़ा नहीं है। इसका संबंध उन प्रणालीबद्ध अभ्यासों से है जिन्हें हजारों सालों में इतने बौद्धिक और शानदार तरीके से बनाया गया था कि वे एक खास तरीके से मन और शरीर को मांजते थे।
एक देश के रूप में हमें दुनिया के सामने उदाहरण बनना चाहिए कि जब हम आजादी की बात करते हैं, तो हमारा मतलब चरम मुक्ति होता है: हर चीज से आजादी, पक्षपात या पूर्वाग्रह से आजादी, भय से आजादी, मृत्यु से आजादी।यही वजह है कि आज के सूचना और प्रौद्योगिकी युग में भी यह देश इतनी सहजता से आगे की ओर बढ़ रहा है। भारत एक देश के रूप में बहुत अनोखा है। ऐसा चरित्र और गुण आपको कहीं और नहीं मिलेगा। जिस जनसमूह को हम भारत कहते हैं, उसका एक खास आयाम रहा है – एक खास जागरूकता और ज्ञान, जो कहीं और मिलना मुश्किल है। लोग जब भी भीतरी खुशहाली के बारे में सोचते हैं, तो पूरब की ओर देखते हैं। क्यों न भारत यह कामना और कोशिश करे की दुनिया का हर देश ध्यान करना सीखे?
तभी मैं ‘योग’ की बात कर रहा था। योग से मेरा मतलब उन तमाम मुद्राओं से नहीं है, जिनमें लोग महारत हासिल करना चाहते हैं। मैं एक पद्धति, एक संपूर्ण तकनीक के रूप में योग की बात कर रहा हूं जो आपके अंदर समावेश की एक भावना ले आता है, जिससे आप हर चीज और हर इंसान को अपना एक हिस्सा समझने लगते हैं। यह आखिरकार आपको उन हकीकतों का एक स्पष्ट बोध कराता है, जिसमें आप मौजूद होते हैं।
विजय बनाम समावेश
किसी इंसान या किसी चीज को अपना बनाने के दो तरीके होते हैं – पहला उसे जीत कर और दूसरा उसे खुद में समावेशित कर। समावेश योग का तरीका है, जबकि जीत बदकिस्मती से आधुनिक विज्ञान का तरीका बन गया है। हमें जीवन की उपलब्धियों के बारे में गलतफहमी है। क्या किसी को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर जीत एक उपलब्धि है या इस तरह समावेश करना उपलब्धि है, कि कोई आपसे प्रेम करने लगे? खास तौर पर बच्चों के दिमाग में भरे उपलब्धि या कामयाबी के नासमझी भरे विचारों को हमें बदलना होगा। हालांकि जबरन कुछ पाने की कोशिश ज्यादा कामयाब होती है, मगर यह बहुत असभ्य तरीका है। समावेश और सौम्यता में ही जीवन की प्रक्रिया फलती-फूलती है।
हम भूल गए हैं कि भारतीय संस्कृति का मर्म या सारतत्व हमेशा इंसान की मुक्ति या मोक्ष रहा है। किसी दूसरी संस्कृति ने इंसान को इतनी गहराई और समझ के साथ नहीं देखा और उसे अपनी चरम प्रकृति तक विकसित होने के तरीके नहीं बनाए।इसलिए हमारी हसरत स्पष्टता से काम करने वाला और जहां तक संभव हो, अपने साथ-साथ दुनिया में हर किसी के लिए खुशहाली लाने वाला देश बनने की होनी चाहिए। बदकिस्मती से दो सदियों तक घोर गरीबी ने हमारे आध्यात्मिक मूल्यों को विकृत कर दिया है। यह हर पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि उसे फिर से अपने सही आकार में लाए ताकि वह फिर से दुनिया के सामने अपनी जबर्दस्त संभावना को दर्शाते हुए इंसान की मुक्ति का एक कारगर उपकरण बन जाए।
इस संस्कृति के लिए अब समय आ गया है कि वह खुद को एक बार फिर से व्यक्त और पुन:स्थापित करे। विदेशी आक्रमणों और गरीबी के कारण हमारी संस्कृति में जो विकृतियां आई हैं, उसने अभी भी आध्यात्मिक डोर को नष्ट नहीं किया है। बेशक इसने हमें सत्ता और दौलत का भूखा बना दिया है। एक देश के रूप में हमें दुनिया के सामने उदाहरण बनना चाहिए कि जब हम आजादी की बात करते हैं, तो हमारा मतलब चरम मुक्ति होता है: हर चीज से आजादी, पक्षपात या पूर्वाग्रह से आजादी, भय से आजादी, मृत्यु से आजादी। उस फोकस को स्थापित करना आज सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि हर इंसान काफी हद तक बाहरी तत्वों की वजह से उलझता है। भय मानव बुद्धि को कई तरह से बाधित करता है। मगर एक बार जब कोई इंसान मुक्ति का चरम लक्ष्य तय कर लेता है, तो उसके लिए और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं होता। वह एक गहन समझ के साथ और जिम्मेदारी की एक भावना के साथ अपना जीवन जीता है। हमें दुनिया में मौजूद गला काट प्रतिस्पर्धा के हालातों का विपरीत उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। हमें ऐसा समाज स्थापित करना चाहिए, जिसकी इज्जत उसकी आक्रामकता या दौलत के कारण नहीं, बल्कि जीवन के ज्ञान के कारण हो। जब तक हम भद्रता, सौम्यता का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, दुनिया कभी इस तरह के विकास के बारे में नहीं जान पाएगी।

Sunday, 9 August 2015

अनाज की बर्बादी

देश में बड़ी संख्या में अभी भी गरीब हैं, जिन्हें या तो दो वक्त रोटी नसीब नहीं होती या फिर इसके लिए उन्हें कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। वहीं दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में आज भी बड़ी मात्र में अनाज खुले आसमान के नीचे पड़े सड़ रहे हैं। पंजाब में भी ऐसे दृश्य कई जगह देखने को मिल जाएंगे, जहां खुले आसमान के नीचे पड़े अनाज सड़ रहे हैं और इस हालत में पहुंच गए हैं कि अब उन पर पशु भी मुंह नहीं मारते। तरनतारन के गांव कदगिल में भी यही तस्वीर दिखाई देती है, जहां 2011 में पनग्रेन की तरफ से खुले आसमान के नीचे स्टोर किया गया 4.75 लाख बोरी गेहूं इस कदर सड़ गया है कि अब यह पशुओं के खाने लायक भी नहीं बचा है। हैरत की बात यह है कि हाईकोर्ट की ओर से एफसीआइ के मैनेजिंग डायरेक्टर, पनग्रेन के एमडी व तरनतारन के डीसी को इस गेहूं को उठाने के आदेश जारी किए गए थे, परंतु किसी ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट भी यह कह चुका है कि सरकारें यदि अनाज का रखरखाव नहीं कर सकती हैं तो उन्हें सड़ाने की बजाय गरीबों में क्यों नहीं बांट देतीं? परंतु हालात जस के तस बने हुए हैं और सभी को इस बात का इंतजार है कि आखिर कब अनाज की इस कदर बर्बादी रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा। पंजाब को कृषि प्रधान प्रदेश कहा जाता है और ऐसे प्रदेश में अन्न की इस तरह बेकद्री कदाचित चिंताजनक व दुखद है। एक तरफ तो प्रदेश सरकार किसानों व गरीबों का हमदर्द होने का दावा करती है, परंतु दूसरी तरफ सरकार व प्रशासन की गलत नीतियों के कारण यही दोनों वर्ग सबसे अधिक दुखी हैं। केंद्र व राज्य सरकार को इस संबंध में गहन चिंतन करना चाहिए और ऐसी नीति बनानी चाहिए, जिससे एक तरफ जहां हर गरीब को आसानी से रोटी मिल सके, वहीं अनाज का एक दाना भी बर्बाद न होने पाए। इसके लिए अन्न के बढ़ते उत्पादन के अनुपात में ही भंडारण की क्षमता भी बढ़ानी चाहिए व साथ ही इसके वितरण में भी तेजी लाई जानी चाहिए ताकि प्रदेश में अनाज का एक दाना भी बर्बाद न होने पाए। अनाज की बर्बादी
अनाज की बर्बादी
अनाज की बर्बादी

Monday, 7 July 2014

खुलासा: विदेश से ज्यादा है देश में कालाधन


आम चुनाव के दौरान भले ही विदेश में कालाधन का मुद्दा गरमाया हो मगर देश में मौजूद कालेधन की हकीकत मोदी सरकार को अंदरखाने हिलाने के लिए काफी है।

कालेधन पर सरकार की 1000 पेज की सनसनीखेज रिपोर्ट के मुताबिक, देश की कुल अर्थव्यवस्था (जीडीपी) का करीब 71 फीसदी तक कालाधन है। इसके हिसाब से करीब 2000 अरब डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था के समानांतर 1400 अरब डॉलर का कालेधन का कारोबार है।

इन आंकड़ों को अगर रुपये में देखें तो 120 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था के समानांतर 83 लाख करोड़ रुपये का कालेधन का कारोबार है।
लोकसभा चुनाव में भारत का करीब 400 से 500 अरब डॉलर का कालाधन विदेशों में होने को मुद्दा बनाने वाली भाजपा को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी की यह रिपोर्ट सियासी रूप से हिला सकती है।

देश में ही कालेधन का सरकारी स्तर पर ऐसा आकलन सामने आने के बाद सरकार और वित्तमंत्री अरुण जेटली के लिए अपने ही मंत्रालय के अधीन इस संस्था की रिपोर्ट की अनदेखी करना आसान नहीं होगा।

कई जानेमाने अर्थशास्त्रियों का कहना है कि विदेश में जमा कालेधन पर सख्ती तो ठीक है मगर कालेधन पर अंकुश लगाकर सूरत बदलने की कोशिश तभी कामयाब होगी जब देश की अर्थव्यवस्था के समानांतर चल रहे देसी कालेधन पर लगाम कसी जाए।

रियल स्टेट, सोना, हीरा और गहने कालेधन के बड़े स्रोत

 

 रिपोर्ट के मुताबिक, रियल एस्टेट के बाद सोना, हीरे और गहने कालेधन के बड़े स्रोत हैं। सोने में कालेधन का आकलन थोड़ा मुश्किल है क्योंकि यह अंदाजा लगाना कठिन है कि लोगों के घरों में जेवरात या ठोस रूप में कितना सोना है। हीरे के कारोबार और बाजार में भी करीब करीब यही स्थिति है। हवाला के जरिए भी सोने और हीरे का काला कारोबार होता है।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि कई बार मुख्य धारा के बैंक भी हवाला के जरिए सोने के काले कारोबार का हिस्सा बन जाते हैं, जिसे रोकने का कोई तरीका नहीं है। शेयर बाजार में डब्बा कारोबार भी काली कमाई का बहुत बड़ा जरिया है।

सेबी और रिजर्व बैंक जैसे रेगुलेटरी अथॉरिटी के तमाम प्रयासों के बावजूद इस पर रोक मुमकिन नहीं हो पाई है। खनन क्षेत्र में भी सालाना करीब 10 फीसदी काला कारोबार होता है। कर्नाटक और गोवा में खनन क्षेत्र में सामने आए घोटालों से पता चला है कि लौह अयस्क बिना हिसाब किताब के सीधे निर्यात कर दिए जाते हैं।
इसके अलावा विदेशी व्यापार में आयात और निर्यात दोनों क्षेत्रों में कम और ज्यादा आंकड़े दिखाकर बड़े पैमाने में कालेधन में घपलेबाजी की जाती है। रिपोर्ट में इसे मिस इनवॉसिंग (बिल में घपलेबाजी) कहा गया है।

वर्ष 2000 से लेकर 2009 तक मिस इनव्यासिंग के तहत करीब 42 अरब डॉलर भारत से स्विट्जरलैंड कालेधन के रूप में भेजे गए। जबकि चीन में 11 अरब डॉलर और अमेरिका में 9 अरब डॉलर भारत से भेजे गए।

रिपोर्ट कहती है कि उदारवादी अर्थव्यवस्था के वैश्विक स्वरूप के कारण मिस इनव्यासिंग की गुंजाइश काफी बढ़ गई है। करीब 20 साल पहले जीडीपी का 15 फीसदी ही आयात और निर्यात का कारोबार था, जो अब बढ़कर जीडीपी का 50 फीसदी हो गया है।

विदेश में 70 लाख करोड़ रुपये का कालाधन होने का अनुमान

 2009 में मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन की पीठ के� समक्ष याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल दीवान ने विदेशी बैंकों में 70 लाख करोड़ रुपये का कालाधन जमा होने का उल्लेख किया था। जबकि देश के विभिन्न राजनीतिक दलों और कुछ अन्य संगठनों का कहना है कि भारतीयों ने 59 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कालाधन स्विस बैंकों में जमा करा रखा है। हालांकि इस संदर्भ में कोई सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

20 साल में कालेधन में तीन गुना हुआ इजाफा
अर्थशास्त्री शंकर आचार्या के आकलन के आधार पर रिपोर्ट का कहना है कि 80 के दशक के आखिरी दिनों और 90 के दशक के शुरुआत में कालाधन जीडीपी का 20 फीसदी तक था लेकिन उदारीकरण के बाद कालाधन जीडीपी का 71 फीसदी तक हो गया है। यानी पिछले करीब 20 साल में उदारीकरण और भौगोलिकीकरण के बाद कालेधन में तीन गुना इजाफा हुआ है। कालेधन में हुए इस वृद्धि को देखते हुए भाजपा सरकार को बाहर से ज्यादा घर के अंदर झांकना जरूरी है।
 दो वॉल्यूम में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, भौगोलिकीकरण के बाद रियल एस्टेट सेक्टर कालेधन का सबसे बड़ा स्रोत है। रियल एस्टेट सेक्टर में कालाधन कितना है इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में 78 प्रतिशत लेनदेन कालेधन के रूप में होता है, जबकि कोलकाता और बंगलूरू के रियल एस्टेट क्षेत्र में यह आंकड़ा 50-50 प्रतिशत है।

मनरेगा जैसी योजनाएं भी कालाधन का बड़ा जरिया

सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और लीकेज भी कालाधन बढ़ाने का बड़ा जरिया बन गया है। रिपोर्ट में बिहार में मनरेगा में भ्रष्टाचार का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि मनरेगा के बजट का करीब 35 से 40 प्रतिशत लीकेज है, जो जाहिर तौर कालेधन में तब्दील हो जाता है।

Tuesday, 28 January 2014

ऐसे तो खत्म नहीं हो सकता भ्रष्टाचार

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इस समय भ्रष्टाचार और ईमानदारी का बड़ा शोर है। जिसे देखो वही इस पर भाषण देता नजर आ जाता है। कुछ लोगों ने यह मान लिया है कि देश से भ्रष्टाचार को खत्म कर दिया जाए तो सारी विसंगतियां की खत्म हो जाएंगी। इसलिए ईमानदारी का चोला पहनकर कुछ लोग राजनीति का शुद्धिकरण करने निकल पड़े हैं। इनका मानना है कि सियासत में बहुत भ्रष्टाचार है। सियासत के भ्रष्टाचार को दूर कर दिया तो गंगा पवित्र हो जाएगी।
यह महा भ्रम है। यह विभ्रम का ऐसा पाठ है जिसका न कोई सिद्धांत हैं और न ही विचार। यह किसी सड़ी-गली व्यवस्था को टानिक देने का ऐसा कृत्य है जिसे इतिहास शायद ही माफ करे।

दरअसल, किसी देश के विकास में भ्रष्टाचार उतना बाधक नहीं होता जितना कि बेरोजगारी, गरीबी और असमानता। भ्रष्टाचार तो इन्हीं तीनों विसंगतियों से उपजता है। जाहिर है कि यदि भ्रष्टाचार को खत्म करना है तो बेरोजगारी, गरीबी और असमानता को खत्म करना होगा। लेकिन इसकी बात कोई नहीं करता। हर कोई देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए उतावला है और कुछ भी ऊल जुलूल बोले जा रहा है। कोई तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर कल्पना की पतंग उड़ा रहा है तो कोई ईमानदारी के लबादे में व्यवस्था परिवर्तन का ख्वाब दिखा रहा है।
दरअसल, देश में इस समय सपने बिक रहे हैं। अपने सपने और अपनी ख्वाहिश पूरी करने के लिए ऐसा चक्रव्यूह बनाया जा रहा है जिसमें हत्या आम जनता की ही की जाएगी। इस चक्रव्यूह का अभिमन्यु वह जनता है, जो इनकी चालाकियों को तो जानती है लेकिन उनके बुने जाल से निकलना नहीं जानती।
ईमानदारी क्या है? एक अमूर्त कृत्य, जो कभी-कभी किसी व्यक्ति के व्यवहार में मूर्त होती है। ऐसा आदर्श है, जो दिखावटी अधिक है और सच से दूर है।  इसी तरह सच भी एक अमूर्त क्रिया है। सच बोलने वाला सच के करीब भी नहीं होता। सौ प्रतिशत सत्यवादी होने का दावा करने वाला भी सच से कोसों दूर होता है।
दरअसल, दोनों ही क्रियाएं संस्कृति से जुड़ी हैं। इनकी अभिव्यक्ति आदमी के व्यवहार में होती है। ईमानदारी और सच वाली संस्कृति किसी प्रकार की टोपी पहनने से नहीं आती, उसे दिन प्रतिदिन के व्यवहार में उतरना पड़ता है। लेकिन बेरोजगारी, गरीबी और असमानता के वातावरण में इसे व्यवहार में कदापि नहीं उतारा जा सकता। ऐसे में या तो टोपी पहनी जाएगी या तो पहनाई जाएगी। आजकल टोपी पहनने और पहनाने के चलन को आदर्शवाद के लबादे में दिखाया जा रहा है।

गौरैया के ल‌िए घर





गौरैया के गायब होने की कहानी कई वर्षों से सुन रहा हूं। इस पर यकीन भी है। चंडीगढ़ और आसपास इस ट्राईस‌िटी में काफी हर‌ियाली है मगर गौरैया आपको द‌िख जाए तो आप खुशकिस्मत हैं। ‌अचानक कुछ दिनों से इन च‌िड़‌ियों का एक झुंड घर के सामने आकर तारों पर बैठने लगा है। झुंड में ज्यादा नहीं आठ या दस गौरैया हैं।
गौरैया को लेकर एक अपराध बोध भी है क‌ि क्या हमारी वजह से गौरैया गायब हुई। काफी लंबे समय बाद इन्हें देखकर बचपन याद हो आया। तब घरों में गौरैया की चहचहाट से ही बच्चे जागते थे। पिसवाने से पहले गेहूं धोकर जब धूप में सुखाये जाते तो बच्चों की ड्यूटी लगती थी कि वे चिंड़ियों को उड़ाएं। बच्चों और च‌िड़‌िया का अपना भवनात्मक संबंध था। वे रखवाली वाले दानों को खुद ब‌िखेर कर च‌िड़ियों को बुलाते थे। चुपचाप शांत होकर उन्हें चुगते देखते थे ताक‌ि वे उड़ न जाएं। चिड़‌िया से ज्ञानवर्धन भी होता था कोई न कोई बुजुर्ग यह बता ही देता था कि ज‌िस गोरिया की चोंच के नीचे गर्दन पर काली दाढ़ी है वह नर है और सफेद गर्दन वाली मादा। गौरैया को पकड़ने की कला भी बच्चों ने खुद विकस‌ित कर रखी थी। टोकरी को ऐसी डंडी से ट‌िकाकर खड़ा करते थे ज‌िसमें लंबी रस्सी बंधी होती थी। टोकरी के नीचे रोटी के टुकड़े रहते थे। च‌िड़िया के आते ही रस्सी खींचकर टोकरी ग‌िरा दी जाती थी। बेचारी च‌िड़‌िया उसमें फंस जाती थी। फिर च‌िड़‌िया को पकड़ कर लाल या नीली स्याही में रंगा जाता था और छोड़ द‌िया जाता था। उस रंगी चड़ि‌या का कई द‌िन तक इंतजार किया जाता था। उसके फ‌िर से द‌िखने पर आपार खुशी होती थी। मगर क्या इन रंगों के खेल से गौरेया गायब हुई।
सबके एक ही आत्मा का अंश होने का दर्शन भी च‌ि‌ड़‌िया ने ही बचपन में पढ़ाया। गौरैया पुराने शहतीर वाले घरों में घौंसला बनाती थी। वह बया की तरह कुशल कारीगर नहीं थी। बसंत बीतने के बाद चैत की गर्म‌ियां शुरू होतीं तो चिड़‌िया का कोई बच्चा फर्श पर ग‌िरा द‌िख जाता था। बच्चों में तब उसे बचाने की जुगत शुरू होती। उसे पानी प‌िलाया जाता, उसके पास दाने डाले जाते। कोई बहादुर बच्चा उसे ग‌िलग‌िले जीव को हथेली पर भी उठा लेता था। इस सब कवायद के बीच वह दम तोड़ देता। दुख से सबकी आंखें भर आती थीं। तब कोई बड़ा यह समझाता था सब जीवों की आत्मा एक ही है। अगर क‌‌िसी को दुख होता है तो सबको दुख होता है। इसल‌िए सारी दुन‌िया दुखी है क्योंक‌ि कोई न कोई दुखी है।
हम बड़े हुए। गौरैया गायब हो गई। घर एयरकंडीशंड हो गए। उनमें शहतीरें और आले नहीं रहे। च‌िड़िया अपने घौंसले कहां बनाती। पेड़ों पर तो कौवा उसके अंडे-बच्चे चुरा ले जाता। लोग म‌िलों का प‌िसा खाने लगे। छतों पर अब गेहूं नहीं सुखाए जाते। चक्क‌ियां और चड़िया दोनों कम हो गईं।
वन्य प्राणी व‌िशेषज्ञ बता रहे हैं क‌ि मोबाइल क्रांत‌ि से च‌िड़‌िया पर बुरा प्रभाव पड़ा है। पर गौरेया की असली समस्या यह है क‌ि वह कहां रहे और क्या खाए। हम चाहें तो च‌िड़या के ल‌िए इतना कर सकते हैं। घर की ऊपरी मंज‌िल पर झीने की छत्त शहतीर और टीन की हो सकती है। इसमें च‌िड़िया के घौंसले के ल‌िए जगह हो सकती है। च‌िड़‌िया आएगी तो बच्चे दानें डाल ही देंगे। बदले में च‌िड़‌िया आपके बच्चों को जीवन का दर्शन भी बताएगी।
हमारे लोकगीतों में च‌िड़या और बेटी की तुलना है।
जब से च‌िड़‌ियों का झुंड घर के सामने बैठने लगा है तब से मन में यह ज‌िज्ञासा है क‌ि यह रह कहां रहा है? इनका घर सुरक्ष‌ित होना चाह‌िए। सर्द‌ियां बीत रही हैं। बसंत आने वाला है। गर्म‌ियां शुरू होते ही अंडों से बच्चे न‌िकलेंगे और कौए ताक में होंगे।